Friday, 4 September 2015

ये इनसान भी ना ???

ये इनसान भी ना जाने कैसे कैसे होते हैं।

लोग डूबते हैँ तो    ... समुंदर को दोष देते हैँ,
मंजिल ना मिले तो   ....  किस्मत को दोष देते हैँ,
खुद तो संभल कर चलते नहीँ जब ठोकर लगती है,
तो पत्थर को दोष देते हैँ ।
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उफ् ये इनसान

बंद कर दिया सांपों को सपेरे ने यह कहकर,
अब इंसान ही इंसान को डसने के काम आएगा।

आत्महत्या कर ली गिरगिट ने सुसाइड नोट छोडकर,
अब इंसान से ज्यादा मैं रंग नहीं बदल सकता।

गिद्ध भी कहीं चले गए
लगता है उन्होंने देख लिया कि,
इंसान हमसे अच्छा नोंचता है।

कुत्ते कोमा में चले गए,ये देख कर कि इंसान तलवे मस्त चाटते है।
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चार बातें हमेशा याद रखो ।

पहली बात:-
हर इंसान इतना बुरा नही होता,
जितना वो पॅन कार्ड और आधार कार्ड मैं दिखता है।
और इतना अच्छा भी नही होता,
जितना वो फेस बुक और वॉटस अप पर दिखता है।

दूसरी बात:-
हर आदमी इतना बुरा नही होता,
जितना उसकी बीबी उसको समझती है।
 और इतना अच्छा भी नहीं होता,
 जितना उसकी माँ उसको समझती है।

तीसरी बात:-
हर आदमी अपनी लाइफ पार्टनर के बारे मैं सोचता है कि वो मिस यूनिवर्स दिखे
और घर मैं काम शांता बाई की तरह करे।

चौथी बात:-
हर औरत अपने लाइफ  पार्टनर के बारे मै सोचती है की वो
अम्बानी तरह कमाए और व्यवहार मनमोहन सिंह की तरह करे।

थोडा सा हँस भी लिया करो।

Sunday, 30 August 2015

क्या यही जिंदगी है...??

यह रचना मेरे मित्र श्री विनोद अगरवालने ई मेल पर भेजी है। उनको प्रणाम और धन्यवाद।
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ज़िंदगी के 20 वर्ष हवा की तरह उड़ जाते हैं.! फिर शुरू होती है नौकरी की खोज.! ये नहीं वो, दूर नहीं पास. ऐसा करते 2-3 नौकरीयां छोड़ते पकड़ते, अंत में एक तय होती है, और ज़िंदगी में थोड़ी स्थिरता की शुरूआत होती है. !
और हाथ में आता है पहली तनख्वाह का चेक, वह बैंक में जमा होता है और शुरू होता है... अकाउंट में जमा होने वाले कुछ शून्यों का अंतहीन खेल..!

इस तरह 2-3 वर्ष निकल जाते हैँ.!
'वो' स्थिर होता है.
बैंक में कुछ और शून्य जमा हो जाते हैं.
इतने में अपनी उम्र के पच्चीस वर्ष हो जाते हैं.!

विवाह की चर्चा शुरू हो जाती है. एक खुद की या माता पिता की पसंद की लड़की से यथा समय विवाह होता है और ज़िंदगी की राम कहानी शुरू हो जाती है.!

शादी के पहले 2-3 साल नर्म, गुलाबी, रसीले और सपनीले गुज़रते हैं.!
हाथों में हाथ डालकर बातें और रंग बिरंगे सपने.!
पर ये दिन जल्दी ही उड़ जाते हैं और इसी समय शायद बैंक में कुछ शून्य कम होते हैं.!
क्योंकि थोड़ी मौजमस्ती, घूमना फिरना, खरीदी होती है.!

और फिर धीरे से बच्चे के आने की आहट होती है और वर्ष भर में पालना झूलने लगता है.!

सारा ध्यान अब बच्चे पर केंद्रित हो जाता है.! उसका खाना पीना , उठना बैठना, शु-शु, पॉटी, उसके खिलौने, कपड़े और उसका लाड़ दुलार.!
समय कैसे फटाफट निकल जाता है, पता ही नहीं चलता.!

इन सब में कब इसका हाथ उसके हाथ से निकल गया, बातें करना, घूमना फिरना कब बंद हो गया, दोनों को ही पता नहीं चला..?

इसी तरह उसकी सुबह होती गयी और बच्चा बड़ा होता गया...
वो बच्चे में व्यस्त होती गई और ये अपने काम में.!
घर की किस्त, गाड़ी की किस्त और बच्चे की ज़िम्मेदारी, उसकी शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शून्य  बढ़ाने का टेंशन.!
उसने पूरी तरह से अपने आपको काम में झोंक दिया.!
बच्चे का स्कूल में अॅडमिशन हुआ और वह बड़ा होने लगा.!
उसका पूरा समय बच्चे के साथ बीतने लगा.!

इतने में वो पैंतीस का हो गया.!
खूद का घर, गाड़ी और बैंक में कई सारे शून्य.!
फिर भी कुछ कमी है..?
पर वो क्या है समझ में नहीं आता..!
इस तरह उसकी चिड़-चिड़ बढ़ती जाती है और ये भी उदासीन रहने लगता है।

दिन पर दिन बीतते गए, बच्चा बड़ा होता गया और उसका खुद का एक संसार तैयार हो गया.! उसकी दसवीं आई और चली गयी.!
तब तक दोनों ही चालीस के हो गए.!
बैंक में शून्य बढ़ता ही जा रहा है.!

एक नितांत एकांत क्षण में उसे वो गुज़रे दिन याद आते हैं और वो मौका देखकर उससे कहता है,
"अरे ज़रा यहां आओ, पास बैठो.!"
चलो फिर एक बार हाथों में हाथ ले कर बातें करें, कहीं घूम के आएं...! उसने अजीब नज़रों से उसको देखा और कहती है,
"तुम्हें कभी भी कुछ भी सूझता है. मुझे ढेर सा काम पड़ा है और तुम्हें बातों की सूझ रही है..!" कमर में पल्लू खोंस कर वो निकल जाती है.!

और फिर आता है पैंतालीसवां साल,
आंखों पर चश्मा लग गया,
बाल अपना काला रंग छोड़ने लगे,
दिमाग में कुछ उलझनें शुरू हो जाती हैं,
बेटा अब कॉलेज में है,
बैंक में शून्य बढ़ रहे हैं, उसने अपना नाम कीर्तन मंडली में डाल दिया और...

बेटे का कॉलेज खत्म हो गया, वह अपने पैरों पर खड़ा हो गया.!
अब उसके पर फूट गये और वो एक दिन परदेस उड़ गया...!!!

अब उसके बालों का काला रंग और कभी कभी दिमाग भी साथ छोड़ने लगा...!
उसे भी चश्मा लग गया.!
अब वो उसे उम्र दराज़ लगने लगी क्योंकि वो खुद भी बूढ़ा  हो रहा था..!

पचपन के बाद साठ की ओर बढ़ना शुरू हो गया.!
बैंक में अब कितने शून्य हो गए,
उसे कुछ खबर नहीं है. बाहर आने जाने के कार्यक्रम अपने आप बंद होने लगे..!

गोली-दवाइयों का दिन और समय निश्चित होने लगा.!
डॉक्टरों की तारीखें भी तय होने लगीं.!
बच्चे बड़े होंगे....
ये सोचकर लिया गया घर भी अब बोझ लगने लगा.
बच्चे कब वापस आएंगे,
अब बस यही हाथ रह गया था.!

और फिर वो एक दिन आता है.!
वो सोफे पर लेटा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था.!
वो शाम की दिया-बाती कर रही थी.!
वो देख रही थी कि वो सोफे पर लेटा है.!
इतने में फोन की घंटी बजी,
उसने लपक के फोन उठाया,
उस तरफ बेटा था.!
बेटा अपनी शादी की जानकारी देता है और बताता है कि अब वह परदेस में ही रहेगा..!
उसने बेटे से बैंक के शून्य के बारे में क्या करना यह पूछा..?
अब चूंकि विदेश के शून्य की तुलना में उसके शून्य बेटे के लिये शून्य हैं इसलिए उसने पिता को सलाह दी..!"
एक काम करिये, इन पैसों का ट्रस्ट बनाकर वृद्धाश्रम को दे दीजिए और खुद भी वहीं रहिये.!"
कुछ औपचारिक बातें करके बेटे ने फोन रख दिया..!

वो पुनः सोफे पर आ कर बैठ गया. उसकी भी दिया बाती खत्म होने आई थी.
उसने उसे आवाज़ दी, "चलो आज फिर हाथों में हाथ ले के बातें करें.!"
वो तुरंत बोली, "बस अभी आई.!"
उसे विश्वास नहीं हुआ, चेहरा खुशी से चमक उठा, आंखें भर आईं,
उसकी आंखों से गिरने लगे और गाल भीग गए,
अचानक आंखों की चमक फीकी हो गई और वो निस्तेज हो गया..!!

उसने शेष पूजा की और उसके पास आ कर बैठ गई, कहा, "बोलो क्या बोल रहे थे.?"
पर उसने कुछ नहीं कहा.!
उसने उसके शरीर को छू कर देखा, शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ गया था और वो एकटक उसे देख रहा था..!

क्षण भर को वो शून्य हो गई, "क्या करूं" उसे समझ में नहीं आया..!
लेकिन एक-दो मिनट में ही वो चैतन्य हो गई,  धीरे से उठी और पूजाघर में गई.!
एक अगरबत्ती जलाई और ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से सोफे पे आकर बैठ गई..!

उसका ठंडा हाथ हाथों में लिया और बोली, "चलो कहां घूमने जाना है और क्या बातें करनी हैं तम्हे.!"
बोलो...!! ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं..!
वो एकटक उसे देखती रही, आंखों से अश्रुधारा बह निकली.!
उसका सिर उसके कंधों पर गिर गया.!
ठंडी हवा का धीमा झोंका अभी भी चल रहा था....!!

यही जिंदगी है...??
नहीं....!!!

संसाधनों का अधिक संचय न करें,
ज्यादा चिंता न करें,
सब अपना अपना नसीब ले कर आते हैं.!
अपने लिए भी जियो, वक्त निकालो..!

सुव्यवस्थित जीवन की कामना...!!
जीवन आपका है, जीना आपने ही है...!!

Friday, 28 November 2014

जरा सोचिये

"जब मुझे यकीन है के भगवान मेरे साथ है।  तो इस से कोई फर्क नहीं पड़ता के कौन कौन मेरे खिलाफ है।।"

तजुर्बे ने एक बात सिखाई है..  .एक नया दर्द ही...  पुराने दर्द की दवाई है...!!

हंसने की इच्छा ना हो...तो भी हसना पड़ता है... कोई जब पूछे कैसे हो...?? तो मजे में हूँ कहना पड़ता है..

ये ज़िन्दगी का रंगमंच है दोस्तों.... यहाँ हर एक को नाटक करना पड़ता है.
"माचिस की ज़रूरत यहाँ नहीं पड़ती.. यहाँ आदमी आदमी से जलता है...!!"

मंदिर में फूल चढ़ा कर आए तो यह एहसास हुआ कि... पत्थरों को मनाने में, फूलों का क़त्ल कर आए हम।
गए थे गुनाहों की माफ़ी माँगने .... वहाँ एक और गुनाह कर आए हम ....

जल जाते हैं मेरे अंदाज़ से मेरे दुश्मन  क्यूंकिएक मुद्दत से मैंने न मोहब्बत बदली और न दोस्त बदले .!!.

एक घड़ी ख़रीदकर हाथ मे क्या बाँध ली.. वक़्त पीछे ही पड़ गया मेरे..!!

सोचा था घर बना कर बैठुंगा सुकून से.. पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला !!!

सुकून की बात मत कर ऐ ग़ालिब.... बचपन वाला 'इतवार' अब नहीं आता |

जीवन की भाग-दौड़ में - क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है ? हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है..

एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम और आज कई बार बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है..

कितने दूर निकल गए, रिश्तो को निभाते निभाते.. खुद को खो दिया हमने, अपनों को पाते पाते..

लोग कहते है हम मुस्कुराते बहोत है, और हम थक गए दर्द छुपाते छुपाते..

"खुश हूँ और सबको खुश रखता हूँ, लापरवाह हूँ फिर भी सबकी परवाह करता हूँ..

चाहता तो हु की ये दुनियाबदल दू .... पर दो वक़्त की रोटी केजुगाड़ में फुर्सत नहीं मिलती दोस्तों

युं ही हम दिल को साफ़ रखा करते थे . पता नही था की, 'किमत चेहरों की होती है!!'

अगर खुदा नहीं हे तो उसका ज़िक्र क्यों ?? और अगर खुदा हे तो फिर फिक्र क्यों ???

"दो बातें इंसान को अपनों से दूर कर देती हैं, एक उसका 'अहम' और दूसरा उसका 'वहम'..

" पैसे से सुख कभी खरीदा नहीं जाताऔर दुःख का कोई खरीदार नही होता।"

किसी की गलतियों को बेनक़ाब ना कर, 'ईश्वर' बैठा है, तू हिसाब ना कर

Thursday, 23 October 2014

दीपावली शुभ कामनाएँ





आज आपके यहाँ धन की बरसात हो ।
माँ लक्ष्मी का वास हो ।
संकटोंका नाश हो ।
हर दिलपर आप का राज हो ।
सरपर उन्नती का सरताज हो ।
घर में शांती का वास हो ।

दीपावली के शुभ अवसरपर शुभ कामनाएँ ।

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इस दीपावली पर

इतने दीपक जलाएं .. कि अँधेरा डरकर भाग जाए
इतना प्यार लुटाएं .. कि दुनिया से नफ़रत मिट जाये
इतनी मिठाइयाँ बाँटें  ..  कि भारत से भूख मिट जाये
इतनी गर्मजोशी से हाथ मिलाएं  ..  कि सारी दुश्मनी मिट जाए। 

अपने मन्दिर के साथ-साथ एक मस्जिद, एक गुरुद्वारे, एक गिरजे में भी दीपक लगाएं
ताकि भारत से धार्मिक उन्माद हट जाए।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक हमारा भारत अनगिनत दीपों की आवली से सज जाए।
हम सभी भारतवासी प्रेम की अमिट डोर से बन्ध जाएं
और दीपावली का यह पर्व सचमुच सार्थक हो जाए।

Saturday, 20 September 2014

रिश्ते या पतंग की डोर

बाप पतंग उड़ा रहा था बेटा ध्यान से देख रहा था। थोड़ी देर बाद बेटा बोला, "पापा ये धागे की वजह से पतंग और ऊपर नहीं जा पा रही है इसे तोड़ दो।"
बाप ने धागा तोड़ दिया, पतंग थोडा सा और ऊपर गई और उसके बाद नीचे आ गई।
तब बाप ने बेटे को समझाया, "बेटा जिंदगी में हम जिस ऊँचाई पर है, हमें अक्सर लगता है की कई चीजे हमें और ऊपर जाने से रोक रही है। जैसे घर, परिवार, अनुशासन, दोस्ती, और हम उनसे आजाद होना चाहते है।
मगर यही चीज होती है जो हमें उस ऊँचाई पर बना के रखती है। उन चीजों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे, मगर बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो पतंग का हुआ। इसलिए जिंदगी में कभी भी अनुशासन का, घर का, परिवार का, दोस्तों का, रिश्ता कभी मत तोड़ना।"



.......................................................................... फेसबुक से

Saturday, 19 July 2014

संस्कृत सुभाषितोंका परिचय - २

सुभाषितोंकी मधुरता अपरंपार है।  सुभाषितोंका माधुर्य देख शराब (द्राक्षा) उदास (म्लान) हो गयी, शक्कर पत्थरके चूर्णके समान हो गयी और अमृत डरके मारे स्वर्गमे चली गयी। (सुभाषितोंका रस शराब, शक्कर और
अमृतसेभी अधिक मधुर होता है।)
सुभाषितोंकी संख्याका ध्यान रखते हुवे पचास सुभाषित पहले विभागमें रखकर अब यह दूसरा विभाग शुरू कर रहा हूँ।
पहले विभागके सारे सुभाषित इस लिंकपर पढे जा सकते हैं।
http://anandjikapitara.blogspot.in/2014/03/blog-post_30.html
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आजका सुभाषित

७५. निर्गुणेष्वपि सत्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः ।
न हि संहरते ज्योत्स्नाम् चन्द्कश्चांडालवेश्मनः।।
सज्जन लोग गुणहीनों पर भी दया करते हैं। चंद्रमा उसका प्रकाश चांडाल के घर पर से समेट नही लेता। (वह सभी लोगों को एक जैसा ही प्रकाश देता है।
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 उदारस्य तृणम् वित्तम् शूरस्य मरणम् तृणम् ।
विरक्तस्य तृणम् भार्या निःस्पृहस्य  तृणम् जगत् ।।
७४. उदार मनुष्य धनदौलत को तृण के समान तुच्छ समझता है। शूर पुरुषको मृत्यू तुच्छ लगता है। विरागी पुरुष को पत्नी महत्व हीन लगती है और निःस्पृह व्यक्ती को सारा संसार तुच्छ लगता है।. जिस प्रकार के व्यक्ती को जिस चीज की आसक्ती न हो वह चीज औरोंको भलेही बहुत महत्वपूर्ण लगती हो, उस व्यक्ती को वह घास जितनी तुच्छ प्रतीत होती है।

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विद्वत्वम् च नृपत्वम् च नैव तुल्य कदाचन ।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते ।।
७३. विद्वत्ता और राजा (सत्ताधीश) होना इनकी तुलना नही हो सकती।. राजा को केवल उसके राज्य मे पूजनीय माना जाता है, राजाका (शासकका) सम्मान  केवल उसी सीमा तक किया जाता है। मगर विद्वानका सम्मान सर्वत्र होता है।

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 नारिकेलसमाकाराः दृष्यन्ते खलु सज्जनाः ।
अन्ये बदरिकाकाराः बहिरेव मनोहराः ।।
७२. सज्जन लोग नारियल के बाहरी रूप जैसे दिखते हैं और अन्य लोग बेर के समान बाह्य रूप से सुंदर होते हैं।
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 सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धम् त्यजति पण़्डितः ।
अर्धेन कुरुते कार्यम् सर्वनाशोहि दुःसहः ।।
७१. सर्वनाश का समय आनेपर ज्ञानी मनुष्य आधेका त्याग करता है और बचाये हुवे आधे भाग से अपना काम चलाता है क्यों कि सर्वनाश सहन करना अधिक कठिन होता है।.

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परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्याः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदम् शरीरम् ।।
७०. दूसरोंकी भलाई के लिये वृक्ष फल देते हैं, दूसरोंकी भलाई के लिये नदियाँ बहती हैं, दूसरोंकी भलाई के लिये गायें दूध देती हैं,  हमें यह शरीर दूसरोंकी भलाई के लिये ही मिला हैं।
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महाजनस्य संसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः ।
पद्मपत्रस्थितम् तोयम् धत्त् मुक्ताफलश्रियम् ।।
६९. महापुरुषों के सहवास से किसकी उन्नति नही होती? (सभी की होती है।) कमल के पत्र पर पडी हुई पानी की बूँद मोती की सी शोभा धारण करती है।
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यथाचित्तम् तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः।
चित्ते वाचि क्रियायाम् च साधूनामेकरूपता ।।
६८. जो मन में है वही वाणी से प्रकट हो। जो बोला गया है उसी के अनुसार तसेच कार्य हो। सज्जनों के मन, वचन और कार्य में एकरूपता होती है। जैसी कथनी वैसी ही करनी होती है।


स्वंत्रतादिन के सुअवसर पर यह सुभाषित


अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।।
६७. हे लक्ष्मण, यह सोनेकी लंका मुझे नही भाती। मेरी माँ तथा जन्मभूमी (मातृभूमी) मुझे स्वर्ग से भी श्रेष्ठ प्रतीत होती है। लंकाविजय के पश्चात श्रीरामजीने वही रहनेका सुझाव दिया गया था, उस पर श्रीरामजीने यह उत्तर दिया था। 
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आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा ।
पात्यते तु क्षणेनाधः तथात्मा गुणदोषयोः ।।
६६. पर्वतपर शिला चढाने के लिये बहुत कष्ट उठाने पडते है, परंतु उसे एक क्षण में नीचे गिराया जा सकता है। उसी तरह सद्गुण प्राप्त करना बहुत कठिन होता है, पर दुर्गुण अनायास ही प्राप्त होते है।
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खद्योतो द्योतते तावत् यावन्नोदयते शशी ।
उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमा ।।
६५. जब तक चंद्र का उदय नही होता तब तक तारा या जुगनू चमकता है और सूर्योदय होने के बाद ना चंद्र चमकता है, ना तारे या ना जुगनू। जहाँ कोई महान व्यक्तिमत्व उपस्थित हो वहाँ किसी भी छोटे व्यक्ती का प्रभाव सीमित रहता है।

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गुणम् पृच्छस्व मा रूपम् , शीलम् पृच्छस्व मा कुलम् ।
सिद्धिम् पृच्छस्व मा विद्याम्, भोगम् पृच्छस्व मा धनम् ।।
६४. गुणोंके बारेमे विचार करो रूपके बारेमे नही, शीलके बारेमे विचार करो कुलके बारेमे नही, सिद्धीके बारेमे विचार करो विद्याके बारेमे नही, उपभोगके बारेमे विचार करो धनके बारेमे नही। मनुष्य के रूप, कुल, विद्या और धन इनकी पेक्षा उसके गुण, शील, यश और विनियोग इनका महत्व अधिक रहता है।
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अप्रार्थितानि दुःखानि यथैवायान्ति देहिनाम् ।
सुखानिच तथा मन्ये दैवमत्रातिरिच्यते।।
जिस प्रकार  प्रार्थना किये बिना दुख मिलते हैं, वैसे ही सुख भी मिल जाते हैं। इसमें दैव ही बलवत्तर होता है ऐसे मै मानता हूँ।.
६३. भाग्यसे सिर्फ दुख ही नही, सुख भी मिल जाते हैं इस तरह का अर्थ भी इस सुभाषित से निकाला जा सकता है।
यह संपूर्णतया दैववादी सिद्धान्त है। दुख से बचने या सुख पाने के वास्ते प्रयत्न ही न करें यह भी सही नही है। वह करने चाहिये ऐसे अन्य कई सुभाषितोंमे कहा गया है।

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एकस्य दुःखस्य न यादवन्तम् ।
गच्छाम्यहम् पारमिवार्णवस्य ।
तावत् द्वितीयम् समुपस्थितम् मे ।
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ।।
६२. मै ज्योंही एक दुःखसागरको पार कर लेता हूँ, दूसरा दुःखसागर सामने आ जाता है। छिद्र (कमजोरी) हो तो वहाँ अनर्थोंकी भरमार हो जाती है। (अपने किसी कमजोरीकी वजहसेही बहुतसे अनर्थ हो जाते हैं। कई दुखोंका कारण अपनाही कोई दोष होता है।)
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अलातम् तिन्दुकस्येव मुहूर्तमपि हि ज्वल ।
मा तुषाग्निरिवानर्चि धूमायस्व चिरम् पुनः ।।
६१. मशालकी तरह थोडेही समयके लिये क्यूँ ना हो, ज्वाला बनकर प्रकाश दे। चिरकालतक सिर्फ धुवाँ छोडते मत रहना। लंबी आयु जीनेसे छोटा पर तेजस्वी जीवन जीना बहतर है।

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 अधः करोषि रत्नानि मूर्ध्ना धारयसे तृणम् ।
दोषस्तवैव जलधे, रत्नम् रत्नम् तृणम् तृणम् ।।
६०. हे सागर, तुम रत्नोंको नीचे तलमें रखते हो और घासको अपने मस्तकपर धारण करते हो यह तुम्हाराही दोष है। आखिर रत्न रत्न ही होता है और घास घासही होती है। (हर किसीकी योग्यता समझ लेनी चाहिये और उसे
योग्य स्थान देना चाहिये।)

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यदीच्छसि वशीकर्तुम् जगदेकेण कर्मणा ।
परापवादसस्येभ्यो गाम् चरन्तीम् निवारय ।।
५९.  यदि संसारको अपने बसमे कर लेनेकी चाह हो तो एकही काम करो। परनिन्दारूपी फसलमे चरनेवाली अपनी बुद्धीरूपी गायको ठीकसे सम्हालो। (लोगोंको अपना बनाना हो तो परनिंदा करनेसे हमें बचना चाहिये।)
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चंदने विषधरान् सहामहे वस्तु सुंदरमगुप्तिमत्कुतः।
रक्षितुम् वद किमात्मसौष्ठवम् संचिताः खदिर कंटकास्त्वया।
५८. चंदनके पेडसे नाग लिपटे रहते है यह बात हम सहन कर सकते (समझ सकते) हैं। सुंदर वस्तूको असुरक्षित कैसे रख सकते है? मगर हे बबूल तू इन काटोंसे कौनसे सौंदर्यकी रक्षा कर रहे हो यह बात क्या तुम बता सकते
हो?
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आहार निद्रा भय मैथुनम् च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मोहि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीना पशुभिः समानाः।।
५७. आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये बातें मानव तथा पशू इन दोनोंमे समान होती है। मानवका धर्म यही एक विशेष (पशूओंसे अलग) बात है, धर्महीन मानव हा पशूसमान होता है।
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 वाङ्माधुर्यात् सर्वलोकप्रियत्वम् ।
वाक्पारुष्यात् सर्वलोकाप्रियत्वम् ।
किंवा लोके कोकिलेनोपकारः ।
किंवा लोके गर्दभेणाप्रकारः।।
५६. मधुर भाषणसे संसारमे लोकप्रियता मिलती है, पर कठोर वचनसे हम सब लोगोंमे अप्रिय हो जाते है। कोयलने संसारका कौनसा बडा उपकार किया है? (जो उसे लोकप्रियता मिली।) और गधेने किसीका क्या बुरा किया है? (जो वह किसीको नही भाता।)
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भद्रम् कृतम् कृतम् मौनम् कोकिलैः जलदागमे ।
दर्दुराः यत्र गायन्ति तत्र मौनं हि शोभनम् ।।
५५. आसमानमे काले बादल घिर आतेही (वर्षा ऋतूके प्रारंभ होतेही) कोयलोंने मौन धारण किया यह बात बहुत अच्छी हुई। जब मेंढकोंने गाना शुरू कर दिया हो, वहाँ (कोयलोंने) चुप रहनेमेही शोभा है।

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को न याति वशे लोके मुखे पिंडेन पूरितः ।
मृदुंगो मुखलेपेन करोति मधुरम् ध्वनिम् ।।
५४. मुखमें कुछ खाना खिलानेपर कौन बसमें नही आयेगा? मृदंगके मुखपर आटेका गोल थापनेपर वह भी तो मधुर आवाज करने लगता है। (संसारमे सारेही लोग खिलाने पिलानेपर खुष होकर मीठा बोलने लगते है।)
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माता यदि विषम् दद्यात् विक्रिणीते पिता सुतम् ।
राजा हरति सर्वस्वम् तत्र का परिवेदना ।।
५३. अगर माताही उसके बच्चेको जहर दे, पिताही बेटेको बेच दे और राजाही प्रजाका सर्वस्व लूट ले तो इसकी शिकायत कहाँ और कैसे करें? (अगर रक्षकही भक्षक न जाये तो क्या करे? बडीही मुश्किल होगी।)
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धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्मात् धर्मो न हन्तव्यः मा नो धर्मः हतोsवधीत् ।।
५२. अगर कोई धर्मका नाश करेगा तो धर्म उसका नाश करता है और जो धर्मका रक्षण करता है उसका रक्षण धर्म करता है। हमे धर्मका नाश नही करना चाहिये ताकि वह अपना नाश नही करेगा। (सुभाषितोंकी रचनाके
कालमे  अलग अलग धर्म नही होते थे, धर्म इस शब्दका अर्थ नीतीनियम होता था)
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न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः । न ते वृद्धाः ये न वदन्ति धर्मम् ।। 
न असौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति । न तत्सत्यम् यच्छलेनाभ्युपेतम् ।।
५१. जहाँ वृद्ध जन न हो वह सभा नही, जो धर्म - नीतीकी बातें न करते हो वे वृद्ध नही, जिसमें सत्य न हो वह धर्म नही और जो कपटसे भरा हो वह सत्य नही। निष्कपट सत्य ही वास्तविक धर्म है जो वृद्ध जनोंके मुखसे
निःसृत होता है।