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Thursday, 2 January 2014

बेटा और बेटी

मेरे डाकबक्सेमे आज एक कविता आयी। वह इस प्रकार है।

    बेटा वारिस है, बेटी पारस है।
    बेटा वंश है, बेटी अंश है।
  बेटा आन है, बेटी शान है।
  बेटा तन है, बेटी मन है।
   बेटा मान है, बेटी गुमान है।
   बेटा संस्कार है, बेटी संस्कृती है।
 बेटा दवा है, बेटी दुवा है।
 बेटा भाग्य है, बेटी विधाता है।
   बेटा शब्द है, बेटी अर्थ है।
   बेटा गीत है, बेटी संगीत है।
 बेटा प्रेम है, बेटी पूजा है।

क्या यह सभी बेटे और बेटियोंको मंजूर है?

किसीने ऐसा कहा है कि बेटा उसकी शादी होनेतक अपना होता है, जबकि बेटी उम्रभरके लिये होती है। मुझे ऐसा लगता है कि यह कहनेवाला जरूर कोई फिरंगा होगा। बेटा और बेटीके बारेमे इस तरहकी संकल्पना पश्चिमी जगतसे आयी होगी। अपने यहाँ तो हमेशा बेटियोंको पराया धन समझा जाता था। पुराने जमानेमे बेटीके पिता उसके ससुरालमे पानीतक नही पीते थे। ऐसी परिस्थितीमे बेटी चाहती तो भी माँबापकी सहायता नही कर सकती थी। बेटेकोही बुढापेकी लाठी माना जाता था। वृध्द मातापिताकी देखभाल उसका कर्तव्य होता था। संयुक्त परिवारमे मातापिता बेटे, बहुएँ, पोते वगैरा लोगोंके साथही रहा करते थे। बेटी उसके ससुरालमे पती, सास, ससुर इन लोगोंके साथ रहती थी।

आजके जमाने नौकरी करनेके लिये बेटे किसी दूसरी जगह चले जाते हैं। कई बार वे विदेशमें जाकर बस लेते हैं। एकही शहरमें रहनेवाले बेटेभी किन्ही कारणोंसे अलग रह लेते हैं।

परिवारके छोटे होनेकी वजहसे हर मातापिताको एक या दो बेटे या बेटियाँही होती है। उनमेंसे कोई पासमे रहते होगे और कोई दूर परदेसमे गये हो।  जरूरत पडनेपर जो कोई पासमें होगा वही तुरंत पहूँच सकता है। आजकल जो कानून है, उनमे बेटियोंकोभी वारिस माना जाता है। अगर किसीके घरमे बेटा होही नही उसके लिये तो बेटी या बेटियाँही सबकुछ होता है। ऐसी काफी उलझने अबके जमानेमे पैदा हुई है।

इन बदलती हुई स्थितीयोंमे पुराने दस्तूर चल नही सकते। मातापिता, बेटे, बेटियाँ इन सभी लोगोंको नये विचार, नये समीकरण तय करने पडते हैं। सभी लोगोंको जिसमें आनंद मिले ऐसे मधुर संबंध रखना होशियारी है।